भारत में बहुराष्ट्रीय कंपनियों का सच – राजीव दिक्षित जी

स्वतंत्रता के बाद देशवासियों को आशा बंधी थी कि रोजगार में वृद्धि से देश में खुशाहाली आएगी और देश फिर से सोने की चिड़िया बन सकेगा। लेकिन ब्रिटिश सरकार ने भारत के देशी उद्योग धंधों को पहले ही नष्ट कर दिया था। कच्चा माल ब्रिटेन जाता था और बदले में तैयार माल आता था। इस प्रकार देश का शासन विशुद्ध व्यापारिक ढंग से ब्रिटिश शाशको द्वारा संचालित था।

भारत एक ऐसा देश हैं जहाँ संसाधनों की कोई कमी नहीं हैं, अगर आप देश मे उपलब्ध संसाधनो की तुलना अमेरिका, चीन,जापान और दक्षिण अफ्रिका मे मौजूद संसाधनों से करेंगे तो भारत किसी प्रकार से इन देशो से पीछे नहीं हैं।

जापान में तो मात्र 1/6 भू भाग ही समतल और कृषि योग्य है, इसका कारण वहां पर आने वाले भूकंप हैं। परन्तु ये देश इतना सक्षम है की कुछ ही समय मे यहाँ का जनजीवन सामान्य और सब कुछ पहले जैसा हो जाता हैं।

अगर भारत की स्तिथि देखी जाए तो यहाँ का मनुष्य हर ज़रुरत की चीज़ों से वंचित रह जाता हैं जिसमे पेयजल, बिजली, सडक जैसी मूलभूत सुविधाए शामिल हैं। इन्ही सेवाओ को पाने के लिए धरने प्रदर्शन करने पड़ते हैं इसके फलस्वरूप ये अपना समय नष्ट कर देते हैं।

हमारी सरकारें आदतानुसार वर्षा अच्छी होने पर भी बिजली पर्याप्त नहीं दे पाती और कई बहाने बनाती हैं कि कोयला खदान में पानी भर जाने से कोयला नहीं पहुँच सका, बिजली की लाइनें खराब हो गई। वहीं वर्षा की कमी होने से सरकार कहती है कि गर्मी के कारण फसलों की सिंचाई व सामान्य उपभोग में बढ़ोतरी के कारण बिजली की कमी आ गयी है। ठीक यही हालत पेयजल की है, हमारी सड़कें बरसात से क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और गर्मी में आंधियों से सड़कें मिटटी से भर जाती हैं।

100 बातों की 1 बात हैं की प्रक्रति हम पर मेहरबान हो या ना हो, हम दोनों ही परिस्तिथियों मे इनका सामना करने की बजाये 1000 बहाने बनाने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं।

भारत एक लोकतान्त्रिक देश है यहाँ नगर परिषद् और नगरपालिकाए गाँव और शहरो मे कार्यरत हैं तो बारिश के दिनों मे इनको नालो की सफायी के लिए काफी दिनों तक शहर और गाँवो की जलापूर्ति रोकनी पड़ती हैं।

इन सभी समस्याओं का आने का कारण सरकार संसाधनों की कमी बताती हैं, परन्तु चुनाव नज़दीक आते ही इन संसाधनों का कही न कही से जुगाड़ हो जाता हैं। जनता को भ्रमित करने के लिए सब सुचारू रूप से कर दिया जाता हैं। वोटो के लिए फिर से वही हथकंडे अपना कर 5 साल के लिए शाशन पर काबिज हो जाते हैं। यह हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था है जिस कारण देश में आर्थिक विकास की गति मंद रही है और स्वतंत्रता के वृक्ष के फल आम आदमी की पहुँच से बाहर हैं।

विकास की गति धीमी होने का एक मात्र कारण लोगो का नौकरशाही और लालफीताशाही से मुक्त न होना हैं। देश में भ्रष्टाचार, सुरक्षा और न्याय व्यवस्था की स्थिति तो और भी खराब है इसके फलस्वरूप आम व्यक्ति अपनी पूर्ण क्षमता से कार्य नहीं कर पाता है। यहाँ ऍम आदमी को कुछ भी नया काम शुरू करने से पहले कई बार सोचना पड़ता हैं।

भारत की तुलना मे जापान एक बहुत ही छोटा देश हैं परन्तु वो हम से हर चीज़ मे समृद्ध हैं। द्वितीय युद्ध 1946 मे जर्जर हो गया था लेकिन विश्व पटल पर आज एक गण्यमान्य स्थान रखता है।

दक्षिण अफ्रिका जो भारत से 14 वर्ष बाद आजाद हुआ उसने भी काफी तेजी से विकास किया है और आज वहां प्रति व्यक्ति आय (10,973 डॉलर) भारत (3,694) से 3 गुणी है वहीं युद्ध जर्जरित व्यवस्था का पुनर्निर्माण करने के बाद आज जापान की प्रति व्यक्ति आय (34,740) भारत से 9 गुणा है। यही नहीं भारत की प्रति व्यक्ति आय विश्व की प्रति व्यक्ति औसत आय (10,700) से भी एक तिहाई है।

आज जिस गति से भारत में हवाई जहाज चलते हैं उस गति से तो जापान में रेलगाड़ी चलती है। भारत में देशी उद्यमियों को जिन छूटों से इनकार किया जाता है वे छूटें विदेशी निवेशकों को दे दी जाती हैं। जिस दर पर विदेशों से घटिया गेहूं आयात किया जाता है वह समर्थन मूल्य देश के मेहनतकश किसानों को उपलब्ध नहीं करवाया जाता है। क्या लोकतंत्र का यही असली स्वरूप है जिसके लिए हमारे पूर्वजों ने अंग्रेजो की लाठियां और गोलियां खाई थी या देश का नेतृत्व फिर विदेशी